“गुरु”


पुण्यप्रसाद घिमिरे
बैत्यश्वर-६, दाेलखा

माता गुरू पिता गुरू,
धर्ति आफैं गिता गुरु।
जन्मे पछि मर्नुपर्छ,
घाट दिव्य चिता गुरु।

पाठशाला वर्ण गुरू,
समस्या ती कर्म गुरू।
बाटा गुरु गन्तव्यका,
जीवन साथी मर्म गुरू।

पदार्थ सब दृष्टि गुरु,
विजहरू सृष्टि गुरु।
सिञ्चनका थाेपाहरू,
मेघ प्राण वृष्टि गुरू।

ईन्द्रधनु रङ्ग गुरू,
तरङ्ग ती ढङ्ग गुरू।
संसार याे शिक्षालय,
पर्वत तीअजङ्ग गुरू।

ध्वनि गुरु स्पर्श गुरु,
उपदेश परामर्श गरू।
नमन गर्छु ज्ञात अज्ञात,
जिन्दगी उत्कर्श गुरू।

सम्पूर्ण ज्ञात अज्ञात गुरूहरूमा हार्दिक नमन।