“खल्लाे दशैँ”


पुण्यप्रसाद घिमिरे
बैत्यश्वर-६, दाेलखा

सिकामा काँक्राे छैन
उखुकाे लाँक्राे छैन,
टालटुल माटाे न कमेराे
मकैकाे थाँक्राे छैन।

झिलिक्क नाना छैन
भरपेट खाना छैन,
हुनेकै तमासा धेरै
ओतिलाे छाना छैन।

गाउँमा साथी छैन,
फर्कने ताँती छैन,
लिङ्गेहीन देउराली
जमारा पाती छ‌ैन।

खैँजडी ताल छैन,
झाँझरी झालछैन,
छमछम नाच्नलाई
सँस्कारीक चाल छैन।

काखकाे छाेरा छैन,
चामल बाेरा छैन,
श्रीमान पर्देशमा
मदानी पाेरा छ‌ैन।

चाडकाे उमङ्ग छैन,
हर्षकाे मृदङ्ग छैन,
मनभरि खल्लाे दशैँ
खुशीकाे तरङ्ग छैन।