Categories: कविता

“गाछ”

एन्जल निलु
राजविराज सप्तरी

गाछ बिरिछ तरक ठण्ढा हावा
दैय हमरा खुब बढावा
जगह जगह पर गाछ लगाबु
जी भैरके अकर लाभ उठाबु ।

नइ करु वन जङ्गल के नाश
आयब प्रलय करत विनाश
गाम सहर आ खेत खलिहान्
छन्भैर मे भ जायत बिरान् ।

यी बात धिया पुता के सिखाबु
सालमे दुई चाइर गाछ लगाबु
तेज गर्मी से बच्चु आ
दोसरो के बचाबु
जंगल उजाइड घर नै बनाबु।

आम, लिच्ची, कटहर आ
जामुन सन गााछ लगाबु
कतेक स्वादिष्ट आ
गुणकारी होयत अछि
बाल बच्चा के बुझाबु ।

गाछ बिरिछ हमर अहाँ के
मौलिक सम्पत्ति छी
अकर संरक्षण करब
से दृड संकल्प करैछी
से दृढ संकल्प करैछी….!!!!।

सारथि बाल पत्रिका

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